जानिए ,मध्यप्रदेश के प्रमुरव राजवंश के बारे में .

इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहें मध्य प्रदेश के मध्यप्रदेश के प्रमुरव राजवंश कौन कौन से हैं के बारे में

सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु पश्चात् उसका सम्पूर्ण राज्य जिसमें मध्यप्रदेश भी था। कई छोटे-बड़े राज्यों में बंटा। मालवा में परमार, विन्ध्य में चंदेल और दक्षिण कोशल में त्रिपुरी के कलचुरि इस समय रहे । कुछ समय तक गुर्जर-प्रतिहार वंश व राष्ट्रकूटों का भी मालवा में शासन रहा।

मध्यप्रदेश के प्रमुरव राजवंश-

राष्ट्रकूट

मालवा, मध्यप्रदेश के दक्षिणी भाग तथा बुन्देलखण्ड के कुछ क्षेत्र, दक्षिण के राष्ट्रकूट वंश के अधिकार में रहे . राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग आठवीं सदी ई. में मालवा पहुँचा। उसने उज्जयिनी में एक उत्सव मनाया और अपनी जीत का दावा किया उनके ताम्रपत्रों और शिलालेखों से इसकी पुष्टि होती है। शिलालेख छिंदवाड़ा, दमोह, उज्जैन और निमाड़ में मिले हैं। ताम्रपत्र बैतूल और मुल्ताई से प्राप्त हुए हैं।

गुर्जर-प्रतिहार

राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के गुर्जर-प्रतिहार की एक शाखा का, आठवीं सदी के प्रारंभ में अवंति पर शासन था। उसका प्रथम शासक नाग भट्ट था और उसकी राजधानी थी उञ्जयिनी। उसने अरबों को अवंति से बाहर खदेड दिया। जिसके कारण उसकी बहुत प्रतिष्ठा बढ़ी। इसी वंश का मिहिर भोज एक प्रतापी राजा माना जाता है। उसने बुन्देलखण्ड पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर में उसके तीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं।

त्रिपुरी के कलचुरि

लगभग आठवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी के मध्य जबलपुर के निकट त्रिपुरी (तेवर) क्षेत्र में कलचुरि वंश का शासन रहा। इन्होंने त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया। कलचुरि वंश के समय भेड़ाघाट (जबलपुर) में चौसठ योगिनी के मंदिर बनें । कलचुरि वंश के गांगेय देव के सोने चांदी के सिक्के बटेला, त्रिपुरी (जबलपुर) व सागर में मिले हैं। कलचुरियों का शासन मूर्तिकला में उन्नत था। इस काल में साहित्य तथा कला का प्रचुर विकास हुआ। अनेक शिलालेखों में कलचुरियों की कला, संस्कृति, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।

मालवा के परमार

दसवीं शताब्दी में मालवा में गुर्जरों और प्रतिहारों की शक्तिहीनता का लाभ उठाते हुए हर्ष सिंह परमार ने कनए राजवंश की स्थापना की जो परमार राजवंश कहलाया। इस राजवंश में मुंज तथा भोज प्रतापी राजा हए। मुंज गाजरात, कर्नाटक, चोल (तमिल प्रदेश) तथा केरल तक के राजाओं पर विजय प्राप्त की।

राजा भोज (1010 से 1055) की गणना भारत के महान् शासकों में की जाती है। भोज एक महान योद्धा,योग्य शासक, कवि, वास्तुकला ज्ञाता एवं कलाप्रेमी था। वह राजधानी उज्जैन से धार ले गया अर्थात् धार को अपनी राजधानी बनाया और उसे खूब सजाया-संवारा भोज ने कई ग्रंथों की रचना की एवं महत्वपूर्ण स्थल निर्मित किए। उसने भोपाल के निकट भोजसागर (वर्तमान भोपाल झील) व भोजपर नगर की स्थापना कर वहाँ शिव मंदिर बनवाया। भोज कला और साहित्य का महान संरक्षक था. परमार राजाओं ने करीब आठवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक मालवा पर राज्य किया।


विंध्य के चन्देल

कनौज के प्रतिहार साम्राज्य के विघटन के उपरांत अनेक स्वतंत्र राज्यों की स्थापना हुई। इनमें से एक बुन्देलखण्ड में, चन्देल वंश का था। नवीं सदी के प्रथम चरण में नन्नुक उसका संस्थापक था। उसके पौत्र, जनशक्ति, जो जेजक और जेज्जा भी कहलाता था, के नाम पर चन्देलों का राज्य जेजाकभुक्ति अथवा जिझौती के नाम से विख्यात हुआ। धंग (सन् 954 से 1002) इस वंश का सबसे प्रतापी राजा हुआ। उसके समय चन्देलों का राज्य उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था।

सन् 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ने कलिंजर, महोबा आदि पर अधिकार कर लिया। चन्देल वंश का परमार्दिदेव उस समय गद्दी पर था। उसके बाद उसके पुत्र त्रैलोक्य वर्मन (1205 से 1241) ने शत्रु से कलिंजर सहित सब क्षेत्र छीन लिया। सन् 1315 तक चन्देलों के राज्य का उल्लेख मिलता है| खजुराही के मंदिर, चन्देलों की गौरव गाथा गाते हुए, आज भी दुनियाँ भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

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